Introducing “शेर.. शायरी.. गीत..“
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एक और weekend..
फ़िर से.. कब पांच दिन निकल गये.. पता ही नही चला.. वैसे ठीक से सोचा जाये तो पांच दिन आखिरि के दो दिनो से बहुत ज्यादा होते हैं.. पर यहां पर सभी गणित फ़ेल हो गयी है.. weekend यानी के आखिरि के दो दिन मुझे पूरे हफ़्ते से बडे लगने लग गये हैं.. शुक्रवार रात से जो येह चालू होता है तो फ़िर सोमवार सुबह तक खत्म होने का नाम नहीं लेता है.. ६० घंटे.. सोचिये.. पता नहीं इस बार कैसे निकलेंगे..
पर एक समय था जब weekend आता है.. तो अजीब सी खुशी होती थी.. ज्यादातर सारी प्लानिंग मैं ही बनाता था.. कहां घूमना है.. कहां खाना-पीना है.. और फ़िर दो मूवी नहीं देखीं तो फ़िर काहे का weekend.. दोस्तॊं के साथ बिताये वो दिन.. क्या दिन थे.. फ़िर चाहे गर्मी हो या ठंड.. और तो ओर बारिश भी नहीं दिखती थी.. वोही ६० घंटे कम पड जाते थे..
यहां पे भी बारिश हो रही है आजकल.. मुझे बहुत पसन्द है येह मौसम.. लेकिन सब बदल गया है.. सब कुछ.. येह मौसम.. येह बारिश.. येह weekend भी..
“दिन खाली-खाली बर्तन है.. ओर रात है जैसे अंधा कुंआ..
इन सूनी अंधेरी आंखो मे.. आंसू की जगह आता है धुंआ..
जीने की वजह तो कोई नहीं.. मरने का बहाना ढूंढता है.. ढूंढता है..
एक अकेला इस शहर में.. रात में और दोपहर में.. आबोदाना ढूंढता है.. आशियाना ढूंढता है..
इन उम्र से लम्बी सडकों को.. मन्ज़िल पे पहुंचते देखा नहीं..
बस दौडती फ़िरती रेहती हैं.. हमने तो ठहरते देखा नहीं..
इस अजनबी से शहर में.. जाना पहचाना ढूंढता है.. ढूंढता है..
एक अकेला इस शहर में.. रात में और दोपहर में.. आबोदाना ढूंढता है.. आशियाना ढूंढता है..
एक अकेला इस शहर में..”
१९७७ की घरोंदा का येह गीत गुल्ज़ार जी का लिखा हुआ है, दिखने मे जितना साधारण है, उतना ही सच भी है.. आज के दोर मे जहां अनेकों कारणों से कभी-कभी हमें अपनों को छोडना पडता है.. कारण कुछ भी हो सकता है.. जैसे की पढाई, या नौकरी..
हर वर्ष हजारों छात्र उच्च शिक्षा या फ़िर विदेश मे नौकरी के लिये बहुत कुछ छोड देते हैं..
येह आपकी कहानी भी हो सकती है.. उन सभी ”अकेलों” को मैं येह गीत dedicate करता हूं..
This Bolg is written in Devanagari Script, in Hindi Language. If you have problem reading Hindi on your computer/machine, following links may be of some help.
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