“दिन खाली-खाली बर्तन है.. ओर रात है जैसे अंधा कुंआ..
इन सूनी अंधेरी आंखो मे.. आंसू की जगह आता है धुंआ..
जीने की वजह तो कोई नहीं.. मरने का बहाना ढूंढता है.. ढूंढता है..
एक अकेला इस शहर में.. रात में और दोपहर में.. आबोदाना ढूंढता है.. आशियाना ढूंढता है..
इन उम्र से लम्बी सडकों को.. मन्ज़िल पे पहुंचते देखा नहीं..
बस दौडती फ़िरती रेहती हैं.. हमने तो ठहरते देखा नहीं..
इस अजनबी से शहर में.. जाना पहचाना ढूंढता है.. ढूंढता है..
एक अकेला इस शहर में.. रात में और दोपहर में.. आबोदाना ढूंढता है.. आशियाना ढूंढता है..
एक अकेला इस शहर में..”
१९७७ की घरोंदा का येह गीत गुल्ज़ार जी का लिखा हुआ है, दिखने मे जितना साधारण है, उतना ही सच भी है.. आज के दोर मे जहां अनेकों कारणों से कभी-कभी हमें अपनों को छोडना पडता है.. कारण कुछ भी हो सकता है.. जैसे की पढाई, या नौकरी..
हर वर्ष हजारों छात्र उच्च शिक्षा या फ़िर विदेश मे नौकरी के लिये बहुत कुछ छोड देते हैं..
येह आपकी कहानी भी हो सकती है.. उन सभी ”अकेलों” को मैं येह गीत dedicate करता हूं..