“एक अकेला इस शहर मे..”

August 10, 2006

एक अकेला इस शहर मे..

Filed under: Introduction — Raj Gaurav @ 9:39 am

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“दिन खाली-खाली बर्तन है.. ओर रात है जैसे अंधा कुंआ..

इन सूनी अंधेरी आंखो मे.. आंसू की जगह आता है धुंआ..

जीने की वजह तो कोई नहीं.. मरने का बहाना ढूंढता है.. ढूंढता है..

एक अकेला इस शहर में.. रात में और दोपहर में.. आबोदाना ढूंढता है.. आशियाना ढूंढता है..

इन उम्र से लम्बी सडकों को.. मन्ज़िल पे पहुंचते  देखा नहीं..

बस दौडती फ़िरती रेहती हैं.. हमने तो ठहरते देखा नहीं..

इस अजनबी से शहर में.. जाना पहचाना ढूंढता है.. ढूंढता है..

एक अकेला इस शहर में.. रात में और दोपहर में.. आबोदाना ढूंढता है.. आशियाना ढूंढता है..

एक अकेला इस शहर में..”

१९७७ की घरोंदा का येह गीत गुल्ज़ार जी का लिखा हुआ है, दिखने मे जितना साधारण है, उतना ही सच भी है.. आज के दोर मे जहां अनेकों कारणों से कभी-कभी हमें अपनों को छोडना पडता है.. कारण कुछ भी हो सकता है.. जैसे की पढाई, या नौकरी..

हर वर्ष हजारों छात्र उच्च शिक्षा या फ़िर विदेश मे नौकरी के लिये बहुत कुछ छोड देते हैं..

येह आपकी कहानी भी हो सकती है.. उन सभी ”अकेलों” को मैं येह गीत dedicate करता हूं..

http://www.musicindiaonline.com/p/d/x/MUmmbCNtxt.As1NMvHdW/ 

7 Comments »

  1. बिल्कुल सही कहा भैया, जब मै कानपुर छोड़कर दिल्ली आया थ और दिल्ली छोड़कर कुवैत आया था तब मेरे को ऐसा ही एहसास होता था। ये मेरा भी बहुत पसन्दीदा गाना है।आबोदाना ढूढने की बात पर याद आया कि हमने भी अपनी अप्रवासी डायरी लिखी थी,अधूरी रह गयी। नोश फरमाएं।

    Comment by जीतू — August 10, 2006 @ 10:50 am

  2. nostalgius maximus

    Comment by kali — August 10, 2006 @ 11:21 am

  3. ऐसा ही है मित्र…गांव वाला कस्बे की ओर भागता है, कस्बे वाला शहर जाता है, शहर वाला मेट्रो…और मेट्रो वाला…विदेश..
    सब अपना अपना आबोदाना ढूंढ रहे हैं

    Comment by नितिन बागला — August 10, 2006 @ 1:02 pm

  4. जब मै छोटा बच्चा था, बडी शरारत …… अरर्रर्र ……
    इसको साबूदाना या रामदाना ढूंढता समझता था।
    बहरहाल यह मेरा भी पसंदीदा गाना है।
    जिंदगी एक भटकाव है, बडे भाग्यशाली (या अभागे) हैं वो जिन्होने अपना शहर नही छोडा।

    Comment by ई-छाया — August 10, 2006 @ 6:44 pm

  5. वाह बहुत सुंदर गाना है – अब मैं अपना बचपन का बताऊँ ;) बहुत लम्बी कहानी है :)

    Comment by SHUAIB — August 11, 2006 @ 12:27 pm

  6. भाई मेरे अपनों से बिछुड़कर रोना पड़ता है,
    कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है.

    Comment by Prabhakar Pandey — September 6, 2006 @ 8:40 am

  7. Bhai..videsh gaya to maine yeh sab kho diya..real jewels of my life…i bet no one wud have lost so much…

    1. My loving wife
    2. My new born kid
    …my whole life is ruined w/o them….i love them and will never forget them…pls pray for me..

    thanks

    Comment by Jazz — March 27, 2009 @ 3:58 am


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