एक और weekend..
फ़िर से.. कब पांच दिन निकल गये.. पता ही नही चला.. वैसे ठीक से सोचा जाये तो पांच दिन आखिरि के दो दिनो से बहुत ज्यादा होते हैं.. पर यहां पर सभी गणित फ़ेल हो गयी है.. weekend यानी के आखिरि के दो दिन मुझे पूरे हफ़्ते से बडे लगने लग गये हैं.. शुक्रवार रात से जो येह चालू होता है तो फ़िर सोमवार सुबह तक खत्म होने का नाम नहीं लेता है.. ६० घंटे.. सोचिये.. पता नहीं इस बार कैसे निकलेंगे..
पर एक समय था जब weekend आता है.. तो अजीब सी खुशी होती थी.. ज्यादातर सारी प्लानिंग मैं ही बनाता था.. कहां घूमना है.. कहां खाना-पीना है.. और फ़िर दो मूवी नहीं देखीं तो फ़िर काहे का weekend.. दोस्तॊं के साथ बिताये वो दिन.. क्या दिन थे.. फ़िर चाहे गर्मी हो या ठंड.. और तो ओर बारिश भी नहीं दिखती थी.. वोही ६० घंटे कम पड जाते थे..
यहां पे भी बारिश हो रही है आजकल.. मुझे बहुत पसन्द है येह मौसम.. लेकिन सब बदल गया है.. सब कुछ.. येह मौसम.. येह बारिश.. येह weekend भी..