“एक अकेला इस शहर मे..”

September 26, 2006

भीगी यादें..

Filed under: Uncategorized — Raj Gaurav @ 10:10 am

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“सीली हवा छू गयी, सीला बदन छिल गया.. नीली नदी के परे, पीला सा चांद खिल गया..”

ये बारिश.. :) ठीक से याद करूं तो पिछले एक साल मे इतनी तेज़ बारिश आज देखी है.. बर्फ़ पडते तो बहुत देखा था, पर पिछले एक साल मे ये पहली ज़ोरदार बारिश है जिसने बहुत कुछ याद दिला दिया है.. वैदर फ़ोरकास्ट है कि अगले कुछ दिन लगातार बारिश होती रहेगी.. इसका मतलब कि मैं तो काम करने से रहा अब.. सीधी भाषा मे मेरा काम-धाम ठप्प.. फ़ील्ड वर्क जो है आजकल.. चलो अच्छा ही है वैसे भी बारिश मे छुट्टी मनाने का शौक तो मुझे स्कूल टाइम से ही है.. :) मेरे शहर की बारिश और वो दिन.. totally unmatched.. मैने अपने पिछले job के दौरान हैदराबाद एवं चेन्नई की बारिश का भी खूब मज़ा उठाया था..आज सुबह-सुबह होस्टल से अपनी University की तरफ़ आते वक्त लगभग पूरा ही भीग गया था.. अगर मेरा laptop पास ना होता तो मै छाता कभी नही लाता.. पर उम्मीद है कि ये मौका जल्दी दोबारा मिल जायेगा.. :) आप सभी ने एक गाना तो जरूर ही सुना होगा..सीली हवा छू गयी.. सीला बदन छिल गया..नीली नदी के परे, पीला सा चांद खिल गया..

तुमसे मिली जो ज़िन्दगी, हमने अभी बोयी नहीं..तेरे सिवा कोई ना था, तेरे सिवा कोई नहीं..

जाने कहां कैसे शहर, लेके चला येह दिल मुझे..तेरे बगैर ना दिन जला, तेरे बगैर शब ना बुझे..

जितना भी तय करते गये, बढते गये ये फ़ासले..मीलों से दिन छोड आये, सालों सी रात लेके चले..

सीली हवा छू गयी.. सीला बदन छिल गया..नीली नदी के परे.. पीला सा चांद खिल गया..”

अगर अपके शहर मे भी बारिश हो रही है तो फ़िर बारिश मे भीगने के बाद, एक गरम कप चाय/काफ़ी के साथ इसे ज़रूर सुनें.. :)

इसे सुनें

September 17, 2006

पढें एवं राय दें..

Filed under: Introduction — Raj Gaurav @ 11:19 am

कुछ नयी पंक्तियां जोडी हैं..

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शुक्रिया.. :)

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