“एक अकेला इस शहर मे..”

दिसम्बर 20, 2006

ताज्जुब है..!!!

Filed under: Uncategorized — Raj Gaurav @ 1:10 अपराह्न

It was a gloomy Saturday afternoon. A flock of birds was spending great time searching for food and playing on the main road. Out of the sudden, a big truck sped through… sad thing had happened again.

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Birds can feel too. Although this bird had already died, another bird flew over immediately, just like a family member, unable to accept the truth.

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The photographer said, he couldn’t shoot any longer. The photographer was so worried that the living bird was going to get hurt by passing cars. So he picked up the dead bird and left it at the roadside. The live one still lingered at a nearby tree as if crying with his singing and refused to leave.

Do humans have the same feelings nowadays..? I wonder..

सितम्बर 26, 2006

भीगी यादें..

Filed under: Uncategorized — Raj Gaurav @ 10:10 पूर्वाह्न

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“सीली हवा छू गयी, सीला बदन छिल गया.. नीली नदी के परे, पीला सा चांद खिल गया..”

ये बारिश.. 🙂 ठीक से याद करूं तो पिछले एक साल मे इतनी तेज़ बारिश आज देखी है.. बर्फ़ पडते तो बहुत देखा था, पर पिछले एक साल मे ये पहली ज़ोरदार बारिश है जिसने बहुत कुछ याद दिला दिया है.. वैदर फ़ोरकास्ट है कि अगले कुछ दिन लगातार बारिश होती रहेगी.. इसका मतलब कि मैं तो काम करने से रहा अब.. सीधी भाषा मे मेरा काम-धाम ठप्प.. फ़ील्ड वर्क जो है आजकल.. चलो अच्छा ही है वैसे भी बारिश मे छुट्टी मनाने का शौक तो मुझे स्कूल टाइम से ही है.. 🙂 मेरे शहर की बारिश और वो दिन.. totally unmatched.. मैने अपने पिछले job के दौरान हैदराबाद एवं चेन्नई की बारिश का भी खूब मज़ा उठाया था..आज सुबह-सुबह होस्टल से अपनी University की तरफ़ आते वक्त लगभग पूरा ही भीग गया था.. अगर मेरा laptop पास ना होता तो मै छाता कभी नही लाता.. पर उम्मीद है कि ये मौका जल्दी दोबारा मिल जायेगा.. 🙂आप सभी ने एक गाना तो जरूर ही सुना होगा..सीली हवा छू गयी.. सीला बदन छिल गया..नीली नदी के परे, पीला सा चांद खिल गया..

तुमसे मिली जो ज़िन्दगी, हमने अभी बोयी नहीं..तेरे सिवा कोई ना था, तेरे सिवा कोई नहीं..

जाने कहां कैसे शहर, लेके चला येह दिल मुझे..तेरे बगैर ना दिन जला, तेरे बगैर शब ना बुझे..

जितना भी तय करते गये, बढते गये ये फ़ासले..मीलों से दिन छोड आये, सालों सी रात लेके चले..

सीली हवा छू गयी.. सीला बदन छिल गया..नीली नदी के परे.. पीला सा चांद खिल गया..”

अगर अपके शहर मे भी बारिश हो रही है तो फ़िर बारिश मे भीगने के बाद, एक गरम कप चाय/काफ़ी के साथ इसे ज़रूर सुनें.. 🙂

इसे सुनें

सितम्बर 17, 2006

पढें एवं राय दें..

Filed under: Introduction — Raj Gaurav @ 11:19 पूर्वाह्न

कुछ नयी पंक्तियां जोडी हैं..

पढें एवं राय दें..

शुक्रिया.. 🙂

अगस्त 21, 2006

शेर.. शायरी.. गीत..

Filed under: Introduction — Raj Gaurav @ 9:43 पूर्वाह्न

Introducing “शेर.. शायरी.. गीत..

Read and Comment.. 🙂

अगस्त 11, 2006

एक और weekend..

Filed under: Uncategorized — Raj Gaurav @ 10:38 पूर्वाह्न

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एक और weekend..

फ़िर से.. कब पांच दिन निकल गये.. पता ही नही चला.. वैसे ठीक से सोचा जाये तो पांच दिन आखिरि के दो दिनो से बहुत ज्यादा होते हैं.. पर यहां पर सभी गणित फ़ेल हो गयी है.. weekend यानी के आखिरि के दो दिन मुझे पूरे हफ़्ते से बडे लगने लग गये हैं.. शुक्रवार रात से जो येह चालू होता है तो फ़िर सोमवार सुबह तक खत्म होने का नाम नहीं लेता है.. ६० घंटे.. सोचिये.. पता नहीं इस बार कैसे निकलेंगे..

पर एक समय था जब weekend आता है.. तो अजीब सी खुशी होती थी.. ज्यादातर सारी प्लानिंग मैं ही बनाता था.. कहां घूमना है.. कहां खाना-पीना है.. और फ़िर दो मूवी नहीं देखीं तो फ़िर काहे का weekend.. दोस्तॊं के साथ बिताये वो दिन.. क्या दिन थे.. फ़िर चाहे गर्मी हो या ठंड.. और तो ओर बारिश भी नहीं दिखती थी.. वोही ६० घंटे कम पड जाते थे..

यहां पे भी बारिश हो रही है आजकल.. मुझे बहुत पसन्द है येह मौसम.. लेकिन सब बदल गया है.. सब कुछ.. येह मौसम.. येह बारिश.. येह weekend भी..

अगस्त 10, 2006

एक अकेला इस शहर मे..

Filed under: Introduction — Raj Gaurav @ 9:39 पूर्वाह्न

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“दिन खाली-खाली बर्तन है.. ओर रात है जैसे अंधा कुंआ..

इन सूनी अंधेरी आंखो मे.. आंसू की जगह आता है धुंआ..

जीने की वजह तो कोई नहीं.. मरने का बहाना ढूंढता है.. ढूंढता है..

एक अकेला इस शहर में.. रात में और दोपहर में.. आबोदाना ढूंढता है.. आशियाना ढूंढता है..

इन उम्र से लम्बी सडकों को.. मन्ज़िल पे पहुंचते  देखा नहीं..

बस दौडती फ़िरती रेहती हैं.. हमने तो ठहरते देखा नहीं..

इस अजनबी से शहर में.. जाना पहचाना ढूंढता है.. ढूंढता है..

एक अकेला इस शहर में.. रात में और दोपहर में.. आबोदाना ढूंढता है.. आशियाना ढूंढता है..

एक अकेला इस शहर में..”

१९७७ की घरोंदा का येह गीत गुल्ज़ार जी का लिखा हुआ है, दिखने मे जितना साधारण है, उतना ही सच भी है.. आज के दोर मे जहां अनेकों कारणों से कभी-कभी हमें अपनों को छोडना पडता है.. कारण कुछ भी हो सकता है.. जैसे की पढाई, या नौकरी..

हर वर्ष हजारों छात्र उच्च शिक्षा या फ़िर विदेश मे नौकरी के लिये बहुत कुछ छोड देते हैं..

येह आपकी कहानी भी हो सकती है.. उन सभी “अकेलों” को मैं येह गीत dedicate करता हूं..

http://www.musicindiaonline.com/p/d/x/MUmmbCNtxt.As1NMvHdW/ 

अगस्त 9, 2006

Just for a start..!!

Filed under: Introduction — Raj Gaurav @ 2:01 अपराह्न

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